चंद्र और सुधा को पास बैठी कुंतल देख रही है......
व ह व्यक्ती जिसने हिन्दी कहानियों और उपन्यासों को पढ़ा हो या केवल सुना हो यह सम्भव नहीं कि उसने धर्मवीर भारती द्वारा रचित उपन्यास "गुनाहों का देवता" के बारे में सुना ना हो। कि तनी गहराई है इस उपन्यास में..। यह केवल एक कहानी नहीं जिसमें नायक और नायिका है ! इसमें सिर्फ एक प्रेम कहानी है जो अधूरी रह गयी यह समीक्षा करना इस कालजयी रचना के साथ न्याय नहीं होगा। ह र सम्भव प्रयास हर भावना को प्रतीक अप्रत्यक्ष रूप से किसी चित्र की भांति उकेरा गया है। प्रस्तुति की प्रशंसा जितनी जी चाहे कर लीजिए कम है। यह भी सम्भव है कि उपन्यास आपको अपनी दुनिया के भीतर खिंचने में सफल रहा हो। अपने आप को आपने कहानी के बीच कई बार कभी चंद्र बनकर पढ़ा होगा तो कभी सुधा बनकर। फिर भी आपके हृदय के भीतर तक चीरती यह पुकार आपको बेबस करती होगी कि सुधा चंद्र की क्यूँ ना हो सकीं? हाय! क्या दुखद है.... क्यूँ बेचारी लाचार बनी रही त्याग दिया अपने प्रेम को फिर भी प्रेम करती रही अंतिम साँस तक केवल और केवल अपने चंद्र को! म हान बनने के लिए अंजाने में और कभी जानबूझकर चंद्र ने ...