चंद्र और सुधा को पास बैठी कुंतल देख रही है......


 वह व्यक्ती जिसने हिन्दी कहानियों और उपन्यासों को पढ़ा हो या केवल सुना हो यह सम्भव नहीं कि उसने धर्मवीर भारती द्वारा रचित उपन्यास "गुनाहों का देवता" के बारे में सुना ना हो। 

कितनी गहराई है इस उपन्यास में..।  यह केवल एक कहानी नहीं जिसमें नायक और नायिका है ! इसमें सिर्फ एक प्रेम कहानी है जो अधूरी रह गयी यह समीक्षा करना इस कालजयी रचना के साथ न्याय नहीं होगा। 

हर सम्भव प्रयास हर भावना को प्रतीक अप्रत्यक्ष रूप से किसी चित्र की भांति उकेरा गया है।  प्रस्तुति की प्रशंसा जितनी जी चाहे कर लीजिए कम है।  यह भी सम्भव है कि उपन्यास आपको अपनी दुनिया के भीतर खिंचने में सफल रहा हो। अपने आप को आपने कहानी के बीच कई बार कभी  चंद्र बनकर पढ़ा होगा तो कभी सुधा बनकर।  फिर भी आपके हृदय के भीतर तक चीरती यह पुकार आपको बेबस करती होगी कि सुधा चंद्र की क्यूँ ना हो सकीं? हाय! क्या दुखद है.... क्यूँ बेचारी लाचार बनी रही त्याग दिया अपने प्रेम को फिर भी प्रेम करती रही अंतिम साँस तक केवल और केवल अपने चंद्र को! 

  महान बनने के लिए अंजाने में और कभी जानबूझकर चंद्र ने कई बार सुधा को ठुकराया... उसके प्रेम को स्वीकार नहीं कर पाया! कितना निर्भागी था वह, जो सुधा को ना समझ पाया! खुद ही सुधा को अपने से दूर कर धकेल दिया उसे तड़पने के लिए।  सुधा ने कहा था चंद्र से कि इस जन्म में ना सही चंद्र हम अलगे जन्म में जरूर मिलेंगे।  मगर चंद्र ने कहा था पुनर्जन्म जैसा कुछ नहीं होता।  सुधा ने तडपकर जवाब दिया था,  "चंद्र अगर पुनर्जन्म जैसी कोई चीज नहीं होती तो तुमने मुझे अनन्तकाल के लिए खो दिया है......!" क्या यही सत्य है प्रेम का? 

आप स्वीकार कर कहेगे हाँ! मगर मैं कहूँ कि उपन्यास जितनी गहराई तक आपको अपने में खींचकर बेचैन करता है यह भ्रम हो जाएगा आपको जब आप सही सम्भावनाओं पर काम करेंगे।  भ्रम? कैसा भ्रम? केवल उपन्यास ही तो है।  क्या ही होगा ज्यादा से ज्यादा कल्पना पर आधारित होगा और क्या.... जी हां कल्पना तो है धर्मवीर भारती जी की।  कला है शब्दों की गहराई है जो एक अच्छे उपन्यास में होने ही चाहिए ।

मगर जब शब्द किसी गुनहगार को कलाकार बनाए तब क्या? वह कला जिसमें किसीके ज़ख्मों के खून की सड़ांध हो! दुर्भाग्य सुधा का नहीं कुंतल का था।  फर्क़ बस यह है कि सुधा का दुख किताब के भीतर है और कुंतल का असली जीवन में है।  कुंतल? अब ये कुंतल कौन है? 

    कांता भारती द्वारा रचित उपन्यास 'रेत की मछली' धर्मवीर भारती जी के उपन्यास 'गुनाहों का देवता' का उत्तर है ऐसा कहा जाता है। रेत की मछली एक ऐसी महिला की कहानी है जिसे पितृसत्तात्मक समाज ने केवल इस्तेमाल किया है और उस मछली को तड़पने के लिए सूखे बेदर्द मरूस्थल की रेत में छोड़ दिया है मरने के लिए। आप जैसे जैसे कहानी को पढ़ते जाते हैं वैसे ही आपको अपने आप ही गुनाहों का देवता याद आने लगता है । 

कई बार ऐसा लगा कि सुधा गुनाहों का देवता में मरी नहीं वह जिंदा है सुधा अपने विवाह के पश्चात भी चंद्र से प्रेम करती है... चंद्र ने बीनती से विवाह तो किया मगर वह भी सुधा को चाहता है.... रेत की मछली में बीनती ही कुंतल है, सुधा ही मीनल है और चंद्र ही शोभन है ना चाहते हुए भी अपने आप कल्पनायें बनने लगती है।  लेकिन इसकी कितनी सम्भावना हो सकती है यह तो कांता भारती जी जानती होंगी ।

     कुंतल और शोभन का प्रेम विवाह हुआ था उनकी प्रथम भेंट में दोनों कुछ बोले नहीं केवल देखा.... ना जाने कितने घंटे लगातार शोभन कुंतल के कमरे की खिड़की के नीचे खड़ा उसका इंतजार करता था सिर्फ एक झलक के लिए। घरवालों से लड़ झगड़ कर कुंतल ने सभी रिश्तों को छोड़कर शोभन का हाथ थामा था।  अपने हाथों से गुलाबो के फूलों की बगिया लगायी थी, बड़े प्रेम से नीला कमरा सजाया था... लेकिन ये क्या? कुंतल की फूलों की बगिया में जंगली लतर लगातर बढ़ी जा रही थी जो प्रेम के फूलों को खा रही थी।  इसकी शिकायत बार बार शोभन से करने पर भी कुछ नहीं हुआ उल्टा शोभन कहता कि जंगली लतर ही तो है बढ़ने दो।  मीनल भी शोभन और कुंतल के बीच जंगली लतर बनकर फल फूल रही थी और दोनों के प्रेम को खा रही थी। 

   समाज और मर्यादा में बंधी कुंतल सबकुछ अपनी आँखों से देख रही थी।  शोभन के व्यावहार में बदलाव फिर भी वह बर्दाश्त कर ही रही थी मगर अपने प्रेम को किसी और के साथ एक ही कमरे में देखने के लिए उसे शोभन ने ही विवश किया था।  समाज में जब तक शोभन की पत्नि के रूप में कुंतल की आवश्यकता पडी तबतक शोभन ने कुंतल का उपयोग किया बाद में उसके साथ पशुओं से भी ज्यादा पतित व्यावहार किया।  हर दिन नया घाव, पहले से अधिक अपमान अंत में कुंतल से ही पत्र लिखवा लेना कि वह स्वयं ही शोभन के साथ नहीं रहना चाहती! उस दिन शोभन रोज़ की तरह दफ्तर चला गया मीनल पहले ही जा चुकी थी।  नौकर से कहलवा दिया कि जबतक वह उस घर से चली नहीं जाएगी शोभन लौटकर नहीं आएगा।  

जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है मन में यह तीव्रता आती है अब तो विद्रोह हो अब तो कोई आंदोलन हो मगर पाठकों के हाथ में सिवाय पन्ने पलटने के कुछ नहीं रहता.... बस मन में ये ही छवी आती है कि सुधा और चंद्र को पास बैठी कुंतल देख रही है।  सुधा और चंद्र ने ना केवल कुंतल को ही धोखे में रखा बल्कि समाज में भी धोखे से अपनी महानता बनाए रखी।  वास्तव में गुनाहों का देवता शोभन आत्मीय रूप से बदसूरत होकर भी समाज में सुन्दर कलाकार बन सकता है ।

 गुनाहों का देवता में सुधा अपने प्रेम का त्याग कर महान बन गयी और कुंतल ने प्रेम पाकर भी नहीं पाया।  क्या स्त्री केवल त्याग और बलिदान के लिए है?  रेत की मछली पितृसत्तात्मक समाज पर वह तमाचा है जो कुंतल जैसी लाखों स्त्रियों की सच्चाई है। सुधा ने तो समाज की रीति निभायी जहां बोला गया विवाह किया मगर कुंतल तो अपने प्रेम के लिए परिवार और समाज से लड़ी फिर क्यूँ इसी समाज ने ही उसे त्याग दिया???  

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